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हरित सावन मनभावन

Posted On: 9 Jul, 2017 Others में

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सावन /श्रावण मास प्रारम्भ हो रहा है। सावन माह के बारे में अनेक पौराणिक प्रसंग और कथाओं का उल्लेख मिलता है। मैं सावन/ श्रावण मास को अपने विचार से इसका अर्थ और सर्वत्र जन मन पर इसका पड़ने वाला प्रभाव अपने शब्दों में अभिव्यक्त करने का प्रयास कर रही हूं।

शाब्दिक अर्थ :
1- सावन = सा + वन

सा = सुन्दर , सुहावना , वन = हरा भरा , हरियाली से भरपूर।

2- श्रावण
श्रा = श्रृंगार, सज्‍जा, सुशोभित, वन = हरियाली, हरीतिमामय।

अर्थात सावन मास में प्रकृति, हमारी धरती ऐसी हरी-भरी दिखायी देती है, मानो श्रृंगार कर सजी-संवरी सुशोभित हो रही होती है, जो हर किसी के मन को सुहावनी लगती है। चाहे मानव हो या फिर पशु पक्षी। सम्पूर्ण दृश्य सुंदर, सुहावना, मनभावन प्रतीत होता है। पक्षियों का मधुर कलरव और खुश होकर नृत्य करते मयूर काे देखने को मिलता है। इन्द्रधनुष की छटा अत्यंत सुन्दर दृश्यमान होती है।
दिन ही नहीं रात का भी दृश्य बहुत सुन्दर लगता है। बदली में छिपता-निकलता चांद, कल्पनालोक में सभी को पहुंचा देता है। हर प्रहर खूबसूरत होती है। सम्भवतः इस समय की प्रकृति की इस खूबसूरती के कारण ही इस मास का नाम सावन / श्रावण रखा गया हो।

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मैंने देखा है, यूं तो सम्पूर्ण प्रकृति व ‘धरती’ सदैव सुंदर लगती है। किंतु वर्ष में दो बार कुछ विशेष रूप से हमारी धरती सजती-संवरती सी प्रतीत होती है। एक- बसंत ऋतु में प्रकृति नवयौवना रूप में मानो अवतरित हुई जान पड़ती है  और दूसरी सावन / श्रावण में जब यह बिल्कुल हरी भरी हरीतिमा ओढ़े सुहानी सलोनी सुंदरी सी नजर आती है। 10 जुलाई 2017 से सावन प्रारम्भ हो रहा है, जो नित्य सबके मन को सुहावना लगने वाला है और सबको हर्षोल्लास से भरपूर रखेगा।

जैसा कि हम सभी अवगत हैं, हमारी भरतीय संस्कृति और हिंदू धर्म में हर माह विशेष देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना की जाती है। सावन में विशेषकर शिव जी की पूजा-अर्चना होती है। ऐसा मानना है कि सावन मास शिव आराधना का है। लोग पूरे माह मुख्यत: सोमवार को शिव दर्शन कर जप-तप और व्रत करते हैं। घर-मंदिर में शिव आराधना भजन-कीर्तन इत्यादि करते हैं।

अनेक भक्तजन कांवरियों में गंगाजल भरकर जय भोले नाथ की, बम बम भोले इत्यादि भक्तिभाव से जयकारा लगाते हुए अनेक शिवालय में जाकर शिव जी को जल अर्पण करते हैं। जलाभिषेक करते हैं। इस प्रकार से यह सावन मास बड़ा पावन मास कहलाता है।

सावन-मनभावन पावस ऋतु में आता है, इसलिए इसमें वर्षा रानी अपना सुन्दर रंग रूप दिखाती है। धरती से अम्बर का मिलन होता स्पष्ट जान पड़ता है। हां, यह भी सच है कि कभी-कभी वर्षा कहीं सुन्दर तो कहीं भयंकर रूप दिखा देती है। (भयंकर का तात्पर्य बाढ़ इत्यादि से है )। वैसे देखा जाय तो सचमुच सावन बड़ा ही सुन्दर सुहावना मास होता है। सभी के हृदय को प्रफुल्लित रखता है। सभी (बच्चों से बुजुर्गों तक) हर प्रकार से हरे-भरे हो जाते हैं।

यद्यपि वर्तमान में बड़े-बड़े शहरों में और जीवन शैलियों के बदलाव के कारण सावन को लेकर पहले जैसी बात नहीँं नजर आती है, फिर भी सावन तो सावन है, छा ही जाता है, इसे कोई नहीं रोक सकता। इसका उदहारण हैं नन्हें बच्चे। आज भी सावन में बच्चों को उत्साह से कागज की नाव को पानी या जलाशय में तैराते देखा जाता है। हल्की बारिश तक उनका क्रिकेट चलता रहता है। सच है कि बारिश की फुहारों में भीगने का मन बच्चों से लेकर बडों तक सबका करता है, तो चंचल बच्चों को कौन रोक सकता है।

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सावन में कहीं नन्ही बालिकाएं गुड़िया-गुड्डा या अपने किचन सेट इत्यादि अनेक खिलौनों को अपनी फ्रेंड के साथ खेलती दिखायी देती हैं। उनको झूला झूलना बहुत पसंद होता है। घर में वे अपने मम्‍मी-पापा से कहकर , कभी हठ करके झूला पेड़ में डलवाती हैं और खुशी से झूलती हैं। शोर मचाती हैं, उनकी खिलखिलाहट जो सबको प्यारी लगती है। सावन में नवयुवकों का एक अलग ही भाव में खोये खोये रहना साफ नज़र आता है। ऐसे में ये लोग लगभग हर समय गीत गुनगुनाते रहते हैं। गीत गाना और सुनना दोनों बहुत भाता है और बहाने से बारिश में भीगना अच्छा लगता है। प्राकृतिक आकर्षण से आकृष्ट हुए नजर आते हैं।

षोडशी यानी नई उम्र की दहलीज में क़दम रखने वाली लड़कियां, जो मन ही मन हरित सावन में कुछ ज्यादा ही तरंगित रहती हैं, उनका मन नित नव रूप में दिखना अर्थात वह बहुत प्रकार से सजती-संवरती रहती हैं। हरी चूड़ियां, हरे-हरे परिधान, मेहन्दी लगाना, सावनी गीत गाना, नृत्य करना, सावनी फुहारों में भीगना, झूला झूलना, रीझना-रिझाना और बात-बात में शरमाकर लाल हो जाना दिखाई देता है।

इस माह में अनेक पर्व होते हैं। युवतियों और सुहागिनें सावनी तीज, गुड़िया, रक्षाबंधन इत्यादि पर्वों को लेकर भी काफी उत्साहित रहती हैं। त्यौहारों में विविध प्रकार के व्यंजन बनाना, खाना खिलाना साथ ही उपहार देना-लेना शौक से करती हैं। प्रायः इन दिनों लड़कियां अपने मायके कुछ दिनों के लिये चली जाया करती हैं। पर्व मनाने , लाड-दुलार पाने और आराम के पल व्यतीत करने। वैसे सावन में मायके वाले भी अपनी बेटियों को पर्व के बहाने अपने पास कुछ दिनों के लिये बुला लेते हैं, ताकि उनकी बेटियां कुछ दिन उनके पास भी रह सकें।

सावन मास पावस ऋतु के अन्तर्गत आता है। अर्थात वर्षा ऋतु, जिसमें जल बरसता है।  देखा जाता है कि जहा एक ओर सावन में श्रृंगार रस छाया रहता है, वहीं दूसरी ओर विरह वेदना से व्याकुल विरहिणियों के नैनों से ‘जल बरसता’ देखा जाता है।

सावन में कवि और रचनाकार अपनी-अपनी कल्पना को नित नये रंग-रूप देकर साहित्य भण्डार को और अधिक सम्पन्न बनाते रहते हैं व अपनी अमिट छाप छोड़ते रहते हैं। जिसका प्रभाव सदियों तक देखा जाता है। गौर करें तो देखेंगे कि सावन बुजुर्गों के लिये उनकी सुनहरी यादों को पुनः जीवंत रूप में लेकर आता है। उनको हर समय बीती यादों में भीगोये रखता है। उन्हें अपने बचपन से लेकर अपने बच्चों के बचपन तक की सभी बातें-यादें रह रहकर बाध्य करती हैं उन्हें मुस्कराने के लिये। हाँ कभी-कभी उनकी आंखों को नम होते भी देखा जाता है। आज भले ही कितना समय बदल गया हो फिर भी सावन तो सावन है। सबको हरा भरा कर जाता है। सावन हम सभी को पूरी तरह प्रभावित करता है और इस प्रकार मेरे दृष्टिकोण से रिमझिम हरित सावन / श्रावण मास अति सुन्दर, सुहावन, पावन व मनभावन होता है।

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