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उसकी आँखें चमक उठी...

Posted On: 21 Aug, 2016 Junction Forum,Hindi Sahitya में

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“गरमागरम गाठिया


कुछ महीने पूर्व हमदोनों पतिपत्नी ‘गुजरात दर्शन’ पर गये थे . सर्वप्रथम अहमदाबाद फिर द्वारिका फिर सोमनाथ दर्शन किया . इसके बाद हमलोग जामनगर पहुंचे ,दोपहर हो गयी थी , इसलिये होटल में ही लंच लिया और थोड़ा आराम किया .
पता था ..यहाँ का “म्युजिकल फाउण्टेन” शो काफी प्रसिद्ध है जो शाम को शुरु होता है. अत:उसे जाकर हमदोनों ने देखा . वाकई शो में जामनगर का इतिहास दिखाया गया, इसके साथ साथ पता चला ‘रणजीत ट्राफी” यही के राजा के नाम से प्रसिद्ध है .क्रिकेट खिलाड़ी ‘ जडेजा’ भी यहीं से हैं इत्यादि . बहुत सुंदर और जानकारी भरा यह शो सचमुच बहुत अच्छा लगा .

अगले दिन हमलोग मार्केट घूमने गये यहां की बंधेज प्रिंट और कढ़ाई का काम दुनियाभर में जाना पहचाना जाता है . अन्य अनेक वस्तुओं से भी बाजार खचाखच भरा था .
यहां के खस्ते ,नमकीन व खाखरे इत्यादि के बारे में भी पता है , बहुत स्वादिष्ट होते हैं , अत: हमलोगों ने ‘कुछ तो यहाँ से खरीद लेंं’ – ऐसा विचार कर उस बड़ी सी दुकान पर रुक गये जहाँ गरमागरम नमकीन क्यंजन बनकर – छानकर तौल किये जा रहे थे ;लोग खरीद रहे रहे थे .
हमलोगों ने भी कई प्रकार के नमकीन व्यंजन लेने के लिये दुकानदार से बोला ही था कि एक भिखारन ( बूढ़ी औरत) हम लोगों से अपने अंदाज कुछ कहने लगी ; हमें उसकी भाषा समझ में तो आयी नहीं -बस इतना समझा कि -इसे कुछ पैसे दे दिया जाय – हमने उसको 10 रुपये का नोट दिया ; तो उसने लेने से मना कर दिया .
फिर उसने जो इशारा किया उससे लगा इसको कुछ खाने की वस्तु दे दी जाय तभी एक बड़ा सा बिस्किट्स का पैकेट खरीद कर उसको देना चाहा ; उसने वो भी मना कर दिया दुकान की कई चीजें संकेत कर पूछी उसने न में सिर हिलाया तो कभी हाथ से मना किया अब हमें बड़ा आश्चर्य हुआ कि यह कैसी भिखारन है ! यह मांग रही है या आदेश कर रही है या फरमाइश कर रही है …या कुछ समझ पाते कि ….. “गरमागरम गाठिया” का घान आ गया …उसकी खुशी से उसकी आँखें चमक उठी ( उसके मुँह से एक अलग प्रकार की खुशी भरी आवाज) निकली .और उसने फिर हाथ से भी संकेत किया ….अबतक सब स्पष्ट हो गया था कि उसे गरमागरम गाठिया खानी थी .

हम लोगों ने एक पैकेट तौल करा कर उसके हाथ में पकड़ाया तो वह इतनी खुश हुई कि .पूछो मत …..और फिर उसने हमलोगों को जिन निगाहों से देखा …उसका वर्णन नहीं कर सकती .

हमें भी बहुत खुशी हुई आखिरकार उस “बूढ़ी औरत” को वह वस्तु दी, जो वो खाना चाह रही थी . .

सच में दूसरों को खुशी देकर अपनी खुशी दुगनी प्रतीत होती है”

मीनाक्षी श्रीवास्तव

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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jitendra Mathur के द्वारा
August 22, 2016

बहुत भावपूर्ण संस्मरण है यह आदरणीया मीनाक्षी जी आपका । कितनी सही बात कही है आपने कि दूसरों को खुशी देकर अपनी खुशी दुगनी प्रतीत होती है ।

    meenakshi के द्वारा
    August 22, 2016

    जितेंद्र जी आपका बहुत- बहुत स्वागत है , मेरे ब्लॉग में . अपनी सकारात्मक प्रतिक्रिया देने के लिए अनेक साभार ..

Shobha के द्वारा
August 22, 2016

प्रिय मीनाक्षी जी आपने गुजरात के दर्शन के साथ एक भावुक प्रसंग का इस तरह वर्णन किया ऐसा लगा जैसे हम उसके पात्र हैं साथ ही वहां मिलने वाले नमकीन भी बता दिए नाम ही मुहँ में पानी लेन के लिए काफी थे आपका जब भी चित्र देखती हूँ मुझे मेरी नन्द याद आती हैं पहले मैं चोंक जाती थी उनको भी लिखने का शौक है| मेरी उनकी गहरी दोस्ती है

    meenakshi के द्वारा
    August 22, 2016

    शोभा जी सादर अभिवादन ! मुझे अच्छा लगा कि आपने मुझे अपनी नन्द की याद दिलाने के उपयुक्त समझा …इस बहाने सही मैं कुछ तो आपके करीब आयी . बहुत बहुत शुक्रिया आपने मेरे ब्लॉग- पोस्ट को पढ़ा. अपने कमेंट्स देने के लिए अनेकानेक साभार ..सादर …


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