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आगामी.. "गौरैया दिवस " पर..

Posted On: 17 Mar, 2016 Junction Forum,Special Days में

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आगामी.. “गौरैया दिवस ” पर..

जागरण जंक्शन  के सभी आदरणीय एवम प्रिय साथियों …मित्रों सभी को मेरा यथोचित अभिवादन !

“ आप सबके समक्ष जिस विषय लेकर विस्तृत चर्चा करने जा रही हूँ, वह हम सभी को पुन: एक बार अपने बचपन की ओर जरूर ले जायेगा , और अपने उन प्यारे दिनों की याद करना किसको नहीं भाता …? अर्थात सभी को बहुत अच्छा लगता है . तो बस उन चंचल…नटखट…शैतानियों …दौड़- भाग ..खेल-कूद और..और भी बहुत कुछ .. याद करने ..के लिये तैयार हो जाइये …

साथियों आगामी 20’th मार्च को “गौरैया दिवस” है . गौरैया का हमारे साथ बचपन से जो रिश्ता जुड़ा वो बहुत प्यारा.. निराला और आजतक बना हुआ है और शायद हमेशा ही बना रहेगा .

गौरैया

“बचपन से गौरैया ने हमको बहुत लुभाया . अपने पीछे बहुत दौड़ाया ..

दाना – पानी खूब पिलाया ….प्यारी गौरैया दुलारी गौरैया

हाँ आधुनिक चकाचौंध और दूषित पर्यावरण से घबरा कर “ गौरैया चिरैया ‘ शायद अब कहीं दूर जा बसी है …जो हमारी बस्ती से  दूर… बहुत दूर …है.

इसके अनेक कारण हैं और सबसे सोचनीय बात यह कि – हम सब इसके लिये जिम्मेदार हैं . आइये देखें वो कौन कौन से कारण हैं ..?

1-  वातावरण के प्रति हमारी उदासीनता अथवा लापरवाही …

2-  अत्यधिक ऊंचे भवन और इमारतें बनना और लगातार बनते जाना ..

3-  हरे भरे वृक्षों का दिन प्रति दिन कटना

“गौरैया’” बेचारी कहाँ घोसला बनायें …?

4-  अनेक औद्योगिक संस्थानों दिन रात वायुमंडल में प्रदूषण फैलाना . जिसके शोर और दूषित वातावरण में उसका जीना दूभर हो गया है।

इसके अतिरिक्त घर – घर में वातानुकूलित संसाधन होने से घरों की खिड़कियों का बंद रहना .’ बेचारी गैरैया घर के अंदर आये तो कैसे आये फुर्र –फुर्र उड़े तो कैसे ..? चीं चीं करे तो कैसे … …?

6-   अधिकांशत: घरों में आजकल पैकेट बंद अन्य सामग्री के साथ गेंहूँ…दाल..चावल..आते हैं . अर्थात अब घरों में अनाज वगैरह धूप में नहीं धोये फैलाये जाते हैं इसलिये अब ‘गौरैया’ दाना चुगने के बहाने आती सो वो भी …नहीं….आ पाती है।     कहने का तात्पर्य ऐसे अनेकनेक कारण जिनकी वजह से हम प्यारी नन्हीं गौरैया से या वो हमसे दूर होती ही जा रही है ; जो किसी भी प्रकार से अच्छा नहीं …

गौरैया जो फुदक – फुदक कर हमारा मन प्रफुल्लित करती रहती थी , पर अब नहीं करती . आज हम लोग इतने खुश और सुकून भरे क्यों नहीं दिखायी देते ; जितने कि पहले हुआ करते थे …क्योंकि हमारे मन को हर्षाने वाली गौरैया न जाने कहाँ चली गयी ….

अब हमारे जीवन में क्या अंतर आया …है आइये देखें …


आज हम अलार्म घड़ी की तीखी ध्वनि से जगते हैं , गौरैया की चहचहाने से नहीं .

बच्चों का बचपन खोता जा रहा है ; वो क्या जाने कौन है ‘गौरैया’ ? क्योंकि अब वो फुर्र फुर्र उड़ती गौरैया को न देखते हैं ; न उसके पीछे दौड़ते हैं . पहले बच्चे उसको दाना ..चावल इत्यादि चुगाते थे …पानी पिलाते थे ;तो उनके दिलोदिमाग में दया करुणा जाग्रत होती थी पर आज बच्चों के अंदर वो सब नहीं …

आज छोटे छोटे से बच्चे क्रोध और गुस्से में आपे से बाहर होते घरों में देखे जाते हैं . कारण प्रकृति से दूर घरों में अधिक बंद रहते हैं .

अब वो कम उम्र में ही बड़े हो जाने लगे हैं .उसकी वजह यह है कि-

बच्चे अब घरों के अंदर रह कर टी.वी. में प्रोग्राम देखते हैं ( जिनमें से कई प्रोग्राम्स तो उनकी उम्र से बड़ों के होते हैं )

इतना ही नहीं  कम्प्यूटर में , मोबाइल में गेम खेलते हैं उसके शोर ( साउण्ड प्रदूषण ) से पीड़ित होते हैं जल्दी ही उंको चश्मा लग जाता है क्योंकि लगातार उसे देखते रहते हैं. कहीं न कहीं दिमाग में भी असर करता है जो फायदेमंद कम हानिकारक अधिक .

सारा दोष जाने अनजाने हम सभी से हुआ है . सारा पर्यावरण दूषित हो गया . हरियाली गायब हो गयी और प्यारी प्यारी नन्हीं गौरैया फुर्र हो गयी न जाने कहाँ …?

जिसकी कमी चारोंओर दिखायी पड़ रही है . अब न प्रकृति में वो चंचलता ..चहचाहट रही है न वो सुगंधित वायु के झोंके .

यद्यपि आज पूरा विश्व इस ओर प्रयासरत है कि – ‘गौरैया’‘ को पुन: बसाया जाय . वह अपनी उसी चंचलता के साथ फुदकना शुरू कर दे और अपने ढेरों झुंड के साथ खुश हो चारों ओर मीठी चहचहाहट फिर से भर दे ..”

*

अत: हम सभी को मिलकर एक जुट होकर प्रयत्न करना होगा सारा वातावरण शुद्ध करना होगा जिससे गौरैया पुन: वापस आये और हर अँगना – उपवन डाली डाली फिर अपने झुण्ड (कुटुम्ब) सहित फुर्र – फुर्र उड़े और सारा जहाँ गुल्जार कर दे .जिससे फिर से एक आनंद की लहर दौड़ जाय …और बच्चे बूढे व युवा सभी प्रफुल्लित हो जायें; जो अत्यावश्यक है .

कुछ पंक्तियाँ …

“कभी गौरैया की चीं-चीं से, नित  सबकी सुबह  होती  थी

मीठी चहचहाहट से सबके,   जीवन में खुशियाँ भरती थी

फुदक – फुदक कर डाली डाली इधर – उधर मंडराती थी

इतना शोर मचाती मिलके ,जबरन सब बच्चों को जगाती

अपना समझ कर हर दिन, घर अँगना में, फुर्र – फुर्र करती

बड़ी फुर्तीली स्वच्छता वाली , छप – छप   खूब  नहाती भी

चोंच में दान ले उड़ जाना , फिर जा अपने बच्चों को चुगाना

घर बनाना बच्चे पालना , ‘उनको’ जीवन -  जीना  सिखाना

सब गुणों में होशियार गौरैया , नन्हीं सी समझदार  चिरैया

कर्मठता का पाठ पढ़ाती , हमको भी हर  लक्ष्य  समझाती

प्यारी गौरैया वापस आ जाओ,  हम सब तुम्हें  बुलाते  हैं

अपने कुनबे संग  बस जाओ , हम सब  तुम्हें  मनाते  हैं

तुम्हारा हम सब ख़याल  रखेंगे , कभी  न  तुमको उदास  करेंगे

भूल हुई थी अनजाने में ,  गौरैया रानी  क्षमा  करो  हमें

नोट:- ( यदि लिखने में कहीं कोई त्रुटि हो, कृपया क्षमा कर दें.)

धन्यवाद !

मीनाक्षी श्रीवास्तव

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16 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

meenakshi के द्वारा
March 26, 2016

आप सभी सम्मानीय और स्नेही जनों का मैं तहे दिल से शुक्रिया _/\_ अदा करती हूँ ; जिनकी वजह से ” बेस्ट ब्लॉगर ऑफ़ दी वीक ” का मुझे सम्मान प्राप्त हुआ है . मीनाक्षी श्रीवास्तव

yamunapathak के द्वारा
March 26, 2016

meenakashee jee saaptaahik samman ke liye badhaaii yah बहुत ही सुन्दर तरीके से aur बहुत ही mahtwapoorn विषय पर लिखा ब्लॉग है. साभार

    meenakshi के द्वारा
    March 26, 2016

    बधाई के साथ साथ प्रशंसनीय प्रतिक्रिया देने के लिए – यमुना जी आपका बहुत बहुत धन्यवाद !

jlsingh के द्वारा
March 25, 2016

सर्वप्रथम आपको साप्ताहिक सम्मान की बधाई आदरणीया मिनाक्षी जी. हममे से बहुतेरे गौरेया के परती चिंतित हैं, काफी लोग औ अपने घरों में इनके लिए दन पानी रखने लगे हैं, पर पेड़ पौधे, वनस्पतियाँ आदि भी जरूरी है इनके लिए. सचमुच इनकी चहचहाट आज भी मन को लुभाती है. आपने बहुत अच्छी तरह से समझने की कोशिश की है उम्मीद है बहुत सारे इस आलेख को पढ़ कर गौरेया को बकहने का हर सम्भव प्रयास करने की कोशिश करेंगे. सादर!

    meenakshi के द्वारा
    March 26, 2016

    बधाई के साथ साथ सकारात्मक प्रतिक्रिया देने के लिए – आदरणीय jlsingh जी आपका बहुत बहुत धन्यवाद !

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
March 25, 2016

मीनाक्षी जी बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति , घर मैं बच्चों से भी अधिक चहचहहाट करने वाली गौरैया अब सूनापन ही दे रही हैं | काश मोदी जी का विकासवादी नजरिया मार्ग बदल सकता । तो शायद फिर एक बार चहचहाट वापिस आते ओम शांति शांति हो जाती

    meenakshi के द्वारा
    March 26, 2016

    प्रशंसनीय व अर्थपूर्ण प्रतिक्रिया देने के लिए – आदरणीय आपका बहुत बहुत धन्यवाद !

sadguruji के द्वारा
March 25, 2016

आदरणीया मीनाक्षी श्रीवास्तव जी ! बहुत महत्वपूर्ण और विचारणीय लेख मंच पर प्रस्तुत करने के लिए आपका सादर अभिनन्दन ! आपके उत्कृष्ट लेख और प्रेरक सन्देश की जितनी भी तारीफ की जाये वो कम है ! आपको होली की बहुत बहुत बधाई !

    sadguruji के द्वारा
    March 25, 2016

    आदरणीया मीनाक्षी जी ! बहुत बहुत अभिनन्दन और ‘बेस्ट ब्लॉगर आफ दी वीक’ चुने जाने की बधाई !

    meenakshi के द्वारा
    March 26, 2016

    बधाई के साथ साथ प्रशंसनीय प्रतिक्रिया देने के लिए – सद्गुरु जी आपका बहुत बहुत धन्यवाद ! पर ..मेरा यह ” सम्मानीय ” ब्लॉग कहीं नजर नहीं आ रहा है , क्यों ..?

Shobha के द्वारा
March 25, 2016

प्रिय मीनाक्षी जी आपकी रचना बेस्ट ब्लागर आफ दा वीक में दी गयी है लेकिन आपका चित्र और लेख का नाम गायब है खाली स्थान पर क्लिक करते ही आपका ब्लाग आ जाता है कृपया देखें

    meenakshi के द्वारा
    March 26, 2016

    शोभा जी , आपने सही कहा , मैंने इसे शेयर किया अन्य पर ..मेरा ब्लॉग नहीं दिखा . आपका बहुत बहुत धन्यवाद !

Shobha के द्वारा
March 20, 2016

प्रिय मीनाक्षी जी आपके लेख ने हिला दिया बंद घरों मैं गौरैया घोंसला कैसे बनाये लगभग दिखाई देनी बंद हो गयी है मेरे घर के पीछे एक पार्क था उसमें एक पेड़ पर अनगिनत गौरैया रहती थी और चह चहाती थी अब उनकी आवाज सुनाई नहीं देती पूछने पर पता चला पता नहीं कहाँ चली गयी | और भी कुछ यादें ताजा हो गयी हम विदेश में रहते थे वहां बर्फ पड़ती थी लेकिन बर्फ के दिनों में भी जब धुप निकलती चिड़ियें आती थीं मैं उन्हें दाना डालती थी यदि इसी दिन भूल जाती थी वह खिड़की पर कांच के पास गाती थी |भागती जिंदगी में हम इस नन्हीं चिड़िया को भूल गए बचपन में सुनी चिड़िया कौआ और चावल और दाल के दाने की कहानी

    meenakshi के द्वारा
    March 26, 2016

    बधाई के साथ साथ प्रशंसनीय प्रतिक्रिया देने के लिए – शोभा जी आपका बहुत बहुत धन्यवाद !

Jitendra Mathur के द्वारा
March 17, 2016

आपसे कविता लिखने में और गोरैया संबंधी भावुकतापूर्ण विचाराभिव्यक्ति में कोई भूल नहीं हुई है मीनाक्षी जी लेकिन वे भूलें लगभग हम सभी से हुई हैं जिनकी ओर आपने इंगित किया है और जिनके कारण हमारी प्यारी गोरैया आज कहीं दिखाई ही नहीं देती । मैंने बचपन में एक छोटे-से गोरैया के बच्चे को रैड लेबल चाय के डिब्बे को झोंपड़ी का रूप देकर और उसमें एक छोटी-सी खिड़की बनाकर पाला था और जब तक वह बच्चा सम्पूर्ण चिड़िया बनाकर एक दिन आकाश में उड़कर सदा के लिए दूर नहीं चला गया था, वह मेरे घर और बालजीवन का अंग था । गोरैया ने तो हमें बहुत कुछ दिया, हम ही उसके अपराधी हैं जो उसे जीवन जीने की सुविधा भी न दे सके । आपके साथ मैं भी गोरैया से क्षमा माँगता हूँ और अनुरोध करता हूँ उससे कि वह हमारे घरों में लौट आए । वह तो दयालु थी और अब भी होगी, हम ही हृदयहीन और स्वार्थी निकले । बहुत-बहुत आभार और अभिनंदन आपका इस समयोचित अभिव्यक्ति और भावभीनी कविता के लिए ।

    meenakshi के द्वारा
    March 26, 2016

    जितेन्द्र माथुर जी बेहतरीन व प्रशंसनीय प्रतिक्रिया देने के लिए – आपका बहुत बहुत धन्यवाद !


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