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दुनिया के मेले में

Posted On: 27 Feb, 2016 में

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दुनिया के मेले में
—..–..–..–..–..—

हम क्यों हुए अकेले से
दुनिया के इस मेले में
..
भेद जो किये थे अपने-पराये
तभी बने हैं पराये से अपने
..
पढ़के पुस्तकें ग्रंथ ऋचायें
तनिक भी एक समझ न पायें
..
गर अपना सबको समझते
बनते कभी न अपने पराये
..
जीवन कितना मधुर हो जाता
हर रिश्ता सुंदर बन जाता
..
परमपिता के घर में रहके
फिर भी बैर आपस में करते
..
‘प्रभु’ को भी यह रास न आता
तभी उसे समझाना पड़ता है
..
रहते सदा अनभिज्ञ करमों से
दोष भाग्य या औरों पर मढ़ते हैं
..
करें किसी से न शिकवा गिला
मिलजुल कर सब रहें सदा
..
‘ मालिक ‘ की रहमतें बनी रहे
जीवन में रौनकें सजी रहे .
..

मीनाक्षी श्रीवास्तव

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