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ऐसे महान कवियों और शायरों का क्या कहना .....

Posted On: 19 Nov, 2012 Others में

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ऐसे महान कवियों और शायरों का क्या कहना …..



अधिकांशतः कवियों ने शायरों ने  स्त्रियों / नारियों के नख से शिख तक  की सुन्दरता पर , उसके सौन्दर्य गुणों एवं

कोमल हाव -भावों  पर हज़ारों कविताएँ गढ़ी है . कवि बिहारी,जायसी ,बाण भट्ट , महाकवि कालिदास और

महाकवि दंडी इत्यादि का श्रृंगार रस का कोई जवाब ही नहीं  ऐसा ऐसा वर्णन किया है . ठीक ऐसे ही शायरों  ने भी

ग़ालिब,क़ामिल, साहिर इत्यादि वैसे नाम तो और भी बहुत हैं .


जहां तक मैं समझती हूँ कि -  हम सभी हिंदी, संस्कृत  पढ़ने बोलने वाले उपर्युक्त अनेक नामों और उनके काव्यों ..साहित्य  तथा शेर -

शायरियों से परिचित हैं – फिर भी कुछ लोगों की इच्छा है कि  कुछ उदाहरण हो तो …इसलिए …पढने वालों का

हमें ध्यान  रखना ही चाहिए – उनका सम्मान करना चाहिए . अतः मैं यहाँ पर अधिक नहीं पर हाँ -  कुछ  उदाहरण स्वरूप “कवि

बिहारी “के   काव्य रचनाओं  में से देना चाहूंगी  :-

काजर दै नहिं री सुहागिन, आँगुरि तो री कटैगी गँड़ासा”


भूषन भार सँभारिहै, क्यौं इहि तन सुकुमार।
सूधे पाइ न धर परैं, सोभा ही कैं भार।। “

“ गोरे मुख पै तिल बन्यो,
सोनजुही सी जगमगी, अँग-अँग जोवनु जोति।”

“कहति नटति रीझति खिझति, मिलति खिलति लजि जात।

भरे भौन में होत है, नैनन ही सों बात॥”


निम्नांकित  एक वर्तमान कवि  की कविता का एक  अंश मात्र द्रष्टि डालें –

“रूप उनका है गुलाबी फूल सा,
पंखुड़ियों से अंग खुशबू से भरे “


अब  मैं कुछ शायरों के  शेरों - शायरियो के अंश ….पेश कर रहीं हूँ -

मिर्ज़ा ग़ालिब – “ हजारों ख्वाईशें ऐसी के हर ख्वाइश पे दम निकले …”

क़ामिल - इन मस्त निगाहों का इक दौर जो चल जाए ….

साहिर – कौन कहता है मुहब्बत की जुबां  होती है…

रूह को शाद करे दिल को जो पुर नूर करे …

हर नज़ारे में ये तनवीर कहां  होती है


आज से नहीं .ज़माने से …ये महान कवि  और शायर ऎसी अनेकों कृतियाँ ..रचनाएं  गढ़ते जा रहें हैं – जिन्हें

सुनकर – पढ़कर लोग ‘ वाह-वाह ‘ करते नहीं थकते .

..कहिये कुछ वर्णन सुन…. लोग दांतों तले अंगुलियाँ  ही दबा लें ….क्या खूब…

भई … ऐसा वर्णन … कवि  जनो की / शायरों की तारीफ़ की झड़ी लग जाती है ..प्रसिद्धि  मिल जाती है …मशहूर

हो जातें हैं .

यद्यपि यह सच है कि  कभी किसी विशेष घटना ..परिथिति में अथवा आवश्कतावश कुछ रचनाएँ ..फिर वह किसी

भी प्रकार की हों लिखी जातीं हैं .”

परन्तु  मेरा विषय यहाँ ” नारी सौन्दर्य और उसके नाज़ुक ..हाव-भाव “..इत्यादि से है ..जिसका कवियों ने शायरों ने तथा अन्य  लोगो ने

बाखूबी ज़िक्र किया है ..और आगे भी ..

लोग कहीं… सोचते भी होंगे कि  शायद इनकी ‘प्रेयसी’ अथवा  ’पत्नी’ ऎसी होगी . पर काश ..कि .. ऐसा होता …

वह अपनी पत्नी की सुन्दरता से उसके कोमल ह्रदय उद्गारों से ..नाज़ुक हाव-भाव से वह कितना परे है! ..वह कितना

अनजान है!… वह कितना बेखबर है ! यह….” उस कवि  की पत्नी ” से पूँछिये ..ये ‘वो’  ही जानती है बेचारी !


ये कैसी विडंबना है !

जिस पर वह मर मिटती है उसके ‘ वो ‘ कहीं….और…खोये रहते हैं …


हाँ , यदि किसी कवि  ने धोखे से …अपनी पत्नी की तारीफ़ में चंद शब्द  बोले भी तो ” तीर-कमान ” बोले …ऐसे

व्यंग भरे होंगें ..कि -बस ……



ऐसे कवियों को / शायरों को क्या कहा जाय ?


अर्थात ..मैं यह कहना चाह रही हूँ कि – कवियों शायरों को कभी अपनी ‘ पत्नी ‘ / अर्धांगिनी  की ओर  तो नज़र

डालें उसके प्यार से हलाहल ह्रदय में डूबे ; उसके उन हर… ज़ज्बातों को जाने – समझे उन पर शेर या कविता बना

कर तो देखें वो सच्ची कविता ..या फिर शेर ..या फिर कोई प्यारा गीत बनेगा .

केवल कल्पनालोक में अथवा  परनारी की सुन्दरता  पर ही नहीं सार्थक कविता ..रूप लेती है…


नोट :-  क्षमा करें – एक बात मैं स्पष्ट कर देना चाहतीं हूँ कि– हर व्यक्ति स्वतंत्र है – अपने  विचारों  को दिशा देने के लिए। अतः उपर्युक्त विचार मेरे अपने है. किसी कवि, शायर अथवा किसी के मान को चोट पहुँचाने से उसका कोई सम्बन्ध  नहीं है . धन्यवाद।



मीनाक्षी श्रीवास्तव






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18 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

preeti jain के द्वारा
May 18, 2015

सुश्री मिनाक्षी जी नमन सिर्फ इतना कहना चाहूंगी कि कवि अपने प्यार के दीये से रोशन करे सब संसार लेकिन प्यार के इस झरने से जब अछूता रहे घरबार तो समझ लो चिराग तले अंधेरा होता है यार आशा है विचार आपको संतोषजनक लगे धन्यवाद

anilsaxena के द्वारा
November 27, 2012

सुश्री मीनाक्षी जी, श्रृंगार लिखना हरेक के बस की बात नहीं, अब श्रृंगार लिखने के लिए कवि या शायर को प्रेरणा कहाँ से मिली होगी यह भी खोजना बड़ा मुश्किल है. किसी ने सही कहा है कि सुन्दरता देखने वाले की आँखों में होती है, बचपन में बिहारी के दोहे पढते कुछ अहसास नहीं होता था, लेकिन आज जब बिहारी को पढते है तो एक सिहरन सी पैदा होती है. स्त्री का श्रृंगार तो बड़े बड़े विश्वामित्रों को हिला चुका है तो बेचारे इंसान की क्या बिसात. रही बात पत्नी को देखकर श्रृंगार रस क्यों नहीं उतरता, तो इसके लिए मैं पत्नी को ही जिम्मेदार मानता हूँ . प्रेमिका के पास बैठकर वो कभी आटा दाल की बात नहीं करेगी, पत्नी के पास बैठो तो सिवाय घर के राशन के कोई दूसरी बात नहीं होती, श्रृंगार तो गया भाड़ में. हांलाकि पत्नी की अपनी मजबूरी है. जब पेट में रोटी होगी तब न श्रृंगार की बात होगी. क्षमा करियेगा, कुछ ज्यादा ही लिख गया हूँ . एक अच्छा मुद्दा उठाने की बधाई.

    meenakshi के द्वारा
    November 27, 2012

    अनिल सक्सेना जी , आपका अनेक-२ धन्यवाद- “ऐसे महान कवियों और शायरों का क्या कहना ” पर प्रतिक्रया देने के लिए. मीनाक्षी श्रीवास्तव

Santlal Karun के द्वारा
November 24, 2012

आदरणीया मीनाक्षी जी, आप ने कवियों की लम्पटगीरी को बारीकी से समझा है, पर दिक्कत यह है कि बड़ी सफाई से उनके साहित्यिक लेखन का जादू भी बरसाती नाले की तरह चल जाता है | इस बारीक पकड़ के लिए हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! “लोग कहीं… सोचते भी होंगे कि शायद इनकी ‘प्रेयसी’ अथवा ’पत्नी’ ऎसी होगी . पर काश ..कि .. ऐसा होता … वह अपनी पत्नी की सुन्दरता से उसके कोमल ह्रदय उद्गारों से ..नाज़ुक हाव-भाव से वह कितना परे है! ..वह कितना अनजान है!… वह कितना बेखबर है ! यह….” उस कवि की पत्नी ” से पूँछिये ..ये ‘वो’ ही जानती है बेचारी ! ये कैसी विडंबना है ! जिस पर वह मर मिटती है उसके ‘ वो ‘ कहीं….और…खोये रहते हैं …”

    meenakshi के द्वारा
    November 25, 2012

    Santlal Karun जी, आपका अनेक-२ धन्यवाद- “ऐसे महान कवियों और शायरों का क्या कहना ” पर सकारात्मक प्रतिक्रया देने के लिए. मीनाक्षी श्रीवास्तव

surendr shukl bhramar5 के द्वारा
November 24, 2012

आदरणीया मिनाक्षी जी ..अच्छे हाव भाव आप की कम से कम आप ने अच्छाई के लिए ही प्रेरित किया ..वैसे ये बात नहीं है की कवि शायर आपने जाने मन जाने तमन्ना को प्रेम नहीं करते या कम करते हैं वे तो दिल से ही बड़े प्रेमी होते है हाँ ये बात जरुर है की वे सुन्दरता सुन्दर शब्द कल्पना लोक के भी प्रेमी होते हैं जरुरी नहीं की पर नारी को देख ही रचना रची जाए रचनाएं तो आँखें बंद किये आती हैं किसी वक्त कहीं भी आती हैं निर्जन में वियावान में भी …. जिसने भी नारी को सराहा उसका सम्मान करना चाहिए लेकिन ये भी बर्दाश्त करना होगा की कहीं कहीं उनमे भी कमी दिखती है अखरती है अपवाद यहाँ भी है … जय श्री राधे भ्रमर ५

    meenakshi के द्वारा
    November 25, 2012

    सुरेन्द्र शुक्ला जी, नमस्कार ! “ऐसे महान कवियों और शायरों का क्या कहना ” पर सकारात्मक प्रतिक्रया देने के लिए आपका बहुत-२ साभार !

अजय यादव के द्वारा
November 23, 2012

आदरणीय मीनाक्षी जी,सादर प्रणाम, सुंदर प्रेरक ,ज्ञानवर्धक रचना | http://avchetnmn.jagranjunction.com/

    meenakshi के द्वारा
    November 25, 2012

    अजय यादव जी, नमस्कार ! अपने प्रेरणात्मक “comments” देने के लिए बहुत -2 धन्यवाद . मीनाक्षी श्रीवास्तव

bebakvichar, KP Singh (Bhind) के द्वारा
November 22, 2012

मीनाक्षी जी, वैसे मैं कवि नहीं हूं परंतु मैं आपके तर्कों से पूरी तरह सहमत भी नहीं हो सकता। मैं नहीं जानता कि आपको यह प्रेरणा कहां से मिली। सम्भव है इसमें आपके अनुसार सच्चाई हो क्योंकि कवि को विषय-प्रेरणा कहां से मिलती है यह कोई नहीं बता सकता। यहां तक कि शायद स्वयं कवि भी नहीं। यह कोई आवश्यक नहीं है कि श्रंगार लिखने वाला केवल दूसरों से ही प्रेरित हो। अब कोई कवि पहले श्रंगार लिखता है और बाद में उसकी शादी होती है तब क्या कहेंगे। ऐसे ही कई कवि ऐसे हैं जो विभिन्न भावों की रचनाएं लिखते हैं। क्या पता किसमें वे अपनी पत्नी या फिर घर-परिवार से प्रेरित होते हों। प्रकृति का वर्णन करने वाला क्या जरूरी है कि वह जंगल जाकर ही प्रेरित हों। ऐसे ही श्रृंगार के लिए जरूरी नहीं कि वह परनारियों को देखकर ही प्रेरित हो। काव्य स्वभावगत अनुभूति है और इसे बिल्कुल यथार्थ पर कैसे जोड़ा जा सकता है। आसमान के तारे तोड़ने का आशय केवल यही तो नहीं कि तारे तोड़े जाएं। रही बात हलाहल की तो अगर किसी पति की पत्नी या फिर पत्नी का पति कवि है तो एक-दूसरा हलाहल हृदय में कैसे रख सकता है। पति-पत्नी का यह सम्बंध तो नहीं हो सकता कि अगर एक नाम-ख्याति रचना से अर्जित करता है तो पत्नी या पति ये कहेंगे कि नहीं मेरे बारे में ऐसा ही लिखिए। अगर एक की प्रगति होगी तो निश्चित तौर पर दूसरे को गौरव महसूस होगा न कि दुख। अब ऐसे में अगर पत्नी हलाहल पिएगी तो फिर जो कवयित्री हैं उनके पति क्या पीते होंगे? जरूरी नहीं कि महिलाएं अपनी रचनाएं अपने पति का ही वर्णन करें। यह अलग बात है कि उसके सद्गुणों का वर्णन वे किसी अन्य रूप में अपनी रचनाओं में करती हों, इसलिए मेरा केवल यही कथन है कि अगर किसी विशेष मामले में ऐसा है तब तो ठीक है परंतु ऐसे में अधिसंख्य को दोषारोपित कैसे किया जा सकता है। फिर बात केवल नारी सौंदर्य, पुरुष सौंदर्य या प्रकृति सौंदर्य की…. सादर….

    meenakshi के द्वारा
    November 23, 2012

    K.P. Singh जी, नमस्कार ! काफी प्रयास के बाद भी जवाब नहीं पोस्ट हो पा रहा था । इस लिए मैंने इस प्रकार , आपका ज़वाब देना उचित लगा । देखिये- मैंने ” सम्पूर्ण कवियों / शायरों ” का उल्लेख नहीं किया है . अधिकांशतः प्रयोग किया है और अपवाद तो हर जगह ..होतें हैं . मैंने काफी वर्षों से.. कई कवियों और उनकी पत्नियों से प्रत्यक्ष मिली हूँ ..और उनकी स्थितियों से अवगत भी हुई हूँ ;इसके अलावा यह बात केवल मैंने ही नहीं महसूस की अन्य बहुत से लोग भी इसे स्वीकारतें हैं…सच्चाई यही है शायद… यह…दुनिया है… भाँति-2 के लोग..और उनकी सोच… आपका हार्दिक धन्यवाद | ” ऐसे महान कवियों और शायरों को क्या कहना ” पर अपने विचार लिखने के लिए | मीनाक्षी श्रीवास्तव

yatindranathchaturvedi के द्वारा
November 22, 2012

बहुत बढियां।

    meenakshi के द्वारा
    November 23, 2012

    Yatindra Nath ji, शुक्रिया |

Sushma Gupta के द्वारा
November 20, 2012

मीनाक्षी जी ,बात तो आपकी बिलकुल ठीक है कि कवियों को स्वयं की पत्निओं पर भी रचनाएं लिखनी चाहिये ,परन्तु कविता कभी भावों की एकरूपता में नहीं बंधती ,बो तो स्वयं ही विषय व् नाईकाएं ढूंढ लेती है फिर कवी का क्या दोष..

    meenakshi के द्वारा
    November 22, 2012

    सुषमा जी नमस्कार ! जी हाँ, मेरा बस इतना कहना था कि – कवि और शायर लोग कभी पत्नियों पर उनके सौन्दर्य और ज़ज्बातों को गौर करें ; और अपने व्यवहार के साथ ही साहित्य में भी उतारेंगे तो अवश्य सच्चा होगा ..सार्थक होगा . आपने पढ़ा और अपने विचार दिए – भला लगा | हार्दिक धन्यवाद अपने विचार देने के लिए. मीनाक्षी श्रीवास्तव

akraktale के द्वारा
November 19, 2012

मीनाक्षी जी                 सादर, यह आलेख तो बहुत ही अपूर्ण है ना कोई तथ्य न कोई नाम, कुछ भी स्पष्ट नहीं हो रहा है. कृपया विस्तार से लिखें.सादर.

    meenakshi के द्वारा
    November 22, 2012

    akraktale ji, नमस्कार ! मेरा बस इतना कहना था कि – कवि और शायर लोग कभी पत्नियों पर उनके सौन्दर्य और ज़ज्बातों को गौर करें ; और अपने व्यवहार के साथ ही साहित्य में भी उतारेंगे तो अवश्य सच्चा होगा ..सार्थक होगा . आपने पढ़ा और अपने सुझाव देकर नेक कार्य किया है . मैंने पुनः कुछ उदाहरण- साहित्यकारों सहित लिखने का प्रयास किया है . क्योंकि इतने विराट साहित्य कृतियों को उदाहरणार्थ – समग्र रूप में अथवा वृहद रूप में भी पेश कर पाना शायद संभव नहीं… धन्यवाद अपने विचार देने के लिए. मीनाक्षी श्रीवास्तव

Abhishek Chandan के द्वारा
November 19, 2012

kuchh ma kahiye wo aise hi thik hain


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