KALAM KA KAMAL

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meenakshi


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उसकी आँखें चमक उठी…

Posted On: 21 Aug, 2016  
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Hindi Sahitya Junction Forum में

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पावन रिश्तों का मान …..

Posted On: 16 Aug, 2016  
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Junction Forum Special Days कविता में

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राष्ट्रीय पर्व “स्वतंत्रता दिवस “

Posted On: 13 Aug, 2016  
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Junction Forum Special Days कविता में

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“रंगोत्सव”

Posted On: 23 Mar, 2016  
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आगामी.. “गौरैया दिवस ” पर..

Posted On: 17 Mar, 2016  
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Junction Forum Special Days में

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दुनिया के मेले में

Posted On: 27 Feb, 2016  
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मधुमास …

Posted On: 10 Feb, 2016  
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Junction Forum कविता में

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“हिन्दी दिवस ”

Posted On: 15 Sep, 2015  
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Others Special Days में

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“चाँद प्यारा लगता है “

Posted On: 20 Aug, 2015  
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Hindi Sahitya Others कविता में

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

आपसे कविता लिखने में और गोरैया संबंधी भावुकतापूर्ण विचाराभिव्यक्ति में कोई भूल नहीं हुई है मीनाक्षी जी लेकिन वे भूलें लगभग हम सभी से हुई हैं जिनकी ओर आपने इंगित किया है और जिनके कारण हमारी प्यारी गोरैया आज कहीं दिखाई ही नहीं देती । मैंने बचपन में एक छोटे-से गोरैया के बच्चे को रैड लेबल चाय के डिब्बे को झोंपड़ी का रूप देकर और उसमें एक छोटी-सी खिड़की बनाकर पाला था और जब तक वह बच्चा सम्पूर्ण चिड़िया बनाकर एक दिन आकाश में उड़कर सदा के लिए दूर नहीं चला गया था, वह मेरे घर और बालजीवन का अंग था । गोरैया ने तो हमें बहुत कुछ दिया, हम ही उसके अपराधी हैं जो उसे जीवन जीने की सुविधा भी न दे सके । आपके साथ मैं भी गोरैया से क्षमा माँगता हूँ और अनुरोध करता हूँ उससे कि वह हमारे घरों में लौट आए । वह तो दयालु थी और अब भी होगी, हम ही हृदयहीन और स्वार्थी निकले । बहुत-बहुत आभार और अभिनंदन आपका इस समयोचित अभिव्यक्ति और भावभीनी कविता के लिए ।

के द्वारा: Jitendra Mathur Jitendra Mathur

के द्वारा: meenakshi meenakshi

के द्वारा: DR. SHIKHA KAUSHIK DR. SHIKHA KAUSHIK

के द्वारा: nishamittal nishamittal

के द्वारा: शालिनी कौशिक एडवोकेट शालिनी कौशिक एडवोकेट

के द्वारा: DR. SHIKHA KAUSHIK DR. SHIKHA KAUSHIK

के द्वारा: सौरभ मिश्र सौरभ मिश्र

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के द्वारा: Madan Mohan saxena Madan Mohan saxena

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हर वर्ष अनेक ऐसे कार्यक्रम आयोजित किये जातें हैं ; जिनसे लगातार हिंदी की प्रगति होती जा रही है. सरकारी , और कई सामाजिक , साहित्यिक संस्थाए हिन्दी को और बढ़ावा देने के लिए कई विषयों पर प्रतियोगिताओं का आयोजन करते हैं- उसमें सुनिश्चित स्थान प्राप्त करने वालों को -पुरस्कृत कर उसको तो ‘हिंदी ‘ के प्रति प्रेरित करते ही हैं साथ ही अन्य लोग भी जो अगले वर्ष स्वयं के चयन और सम्मान प्राप्ति की आशा से हिंदी के प्रति आकर्षित और जागरूक होते हैं। पहले की अपेक्षा लोग आज हिंदी में अधिक लेखन-कार्य करते हैं। जितना हिन्दी का भण्डार आज विभिन्न क्षेत्र में मिलेगा शायद पहले न था। यानी “हिन्दी का विकास हो रहा है , हिन्दी व्यापक होती जा रही है। “बढ़िया मौर सशक्त लेखन आदरणीय मिनाक्षी जी !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: शालिनी कौशिक एडवोकेट शालिनी कौशिक एडवोकेट

के द्वारा: meenakshi meenakshi

के द्वारा: deepakbijnory deepakbijnory

मदन मोहन जी , “हरियाली तीज“ महोत्सव" अपनी उम्दा टिप्पणी देने के लिए - मेरा हार्दिक धन्यवाद स्वीकार करें . मदन मोहन जी- आपने अपने ब्लॉग पर निमंत्रण दिया है ; शुक्रिया . वैसे मेरा यह प्रयास रहता है कि - जिन महानुभावों ने मेरे ब्लॉग पर अपनी प्रतिक्रिया दी होती है ; मैं उनके ब्लॉग में जाकर अवश्य कमेंट्स करती हूँ. इसके अलावा भी लोगों के ब्लॉग पे कमेंट्स देती हूँ ; जितना समय मिलता है . परन्तु कभी -२ नेट की गड़बड़ी के कारण - कमेंट्स पता नहीं कहाँ चले जातें है - पोस्ट नहींहो पाते - मैंने इस बारे में कई बार jj को लिखा भी है . ..पर मेरा प्रयास ....होता जरूर है. क्योंकि कमेंट्स पढ़ने के बाद हर किसी के भीतर एक नयी शक्ति ..नयी प्रेरणा मिलाती है जो - अनिवार्य होती है . मीनाक्षी श्रीवास्तव

के द्वारा: meenakshi meenakshi

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के द्वारा: meenakshi meenakshi

के द्वारा: ajaykr ajaykr

के द्वारा: meenakshi meenakshi

सुश्री मीनाक्षी जी, श्रृंगार लिखना हरेक के बस की बात नहीं, अब श्रृंगार लिखने के लिए कवि या शायर को प्रेरणा कहाँ से मिली होगी यह भी खोजना बड़ा मुश्किल है. किसी ने सही कहा है कि सुन्दरता देखने वाले की आँखों में होती है, बचपन में बिहारी के दोहे पढते कुछ अहसास नहीं होता था, लेकिन आज जब बिहारी को पढते है तो एक सिहरन सी पैदा होती है. स्त्री का श्रृंगार तो बड़े बड़े विश्वामित्रों को हिला चुका है तो बेचारे इंसान की क्या बिसात. रही बात पत्नी को देखकर श्रृंगार रस क्यों नहीं उतरता, तो इसके लिए मैं पत्नी को ही जिम्मेदार मानता हूँ . प्रेमिका के पास बैठकर वो कभी आटा दाल की बात नहीं करेगी, पत्नी के पास बैठो तो सिवाय घर के राशन के कोई दूसरी बात नहीं होती, श्रृंगार तो गया भाड़ में. हांलाकि पत्नी की अपनी मजबूरी है. जब पेट में रोटी होगी तब न श्रृंगार की बात होगी. क्षमा करियेगा, कुछ ज्यादा ही लिख गया हूँ . एक अच्छा मुद्दा उठाने की बधाई.

के द्वारा: anilsaxena anilsaxena

के द्वारा: shalinikaushik shalinikaushik

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

सुषमा जी सस्नेह अभिवादन ! मैंने इस विषय के माध्यम से - सिर्फ एक नज़रिए पे बदलाव या या द्रष्टिकोण में परिवर्तन लाने की कोशिश की है, बस । क्योंकि कई कवियों और उनकी पत्नियों की स्थिति को मैंने बड़े करीब से देखा और जाना । तत्पश्चात यह सोचने पर मैं विवश हो गयी कि - क्या कल्पनालोक में ही भ्रमण करना एक कवि का धर्म है ..? क्या वो खूबसूरत कलपना " जो ईश्वरीय प्रदत्त " दिन-रात .. उसके 'अपने कवि पति' प्रेमाकांक्षा में जीवन ..जीती चली जाती है ; क्या एक कवि ह्रदय से इतना बेरुखा ....? कभी वास्तविक जीवन में (अपनी पत्नी) के / उसके भाव पढ़े ..उनपर ...अपने प्यार भरी ( भावात्मक ) सौगात लुटाये. व्यंगबाण ... नहीं । जी, सुषमा जी , मैंने ऐसा नहीं कहा - न मैं ऐसा सोचती हूँ कि - इस ' प्रसंग/ विषय के अलावा इन कवियों और शायरों के पास और कोई विषय अथवा कल्पना नही हो सकती । यह बात दोनों के लिए है .और अपवाद भी सर्वत्र होतें है ..पर बात अधिकांशतः पर थी, सो - मैंने लिखना चाहा .. इस विषय पर आपने अपने विचार लिखे - आपका अनेकानेक हार्दिक धन्यवाद ! मीनाक्षी श्रीवास्तव

के द्वारा: meenakshi meenakshi

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

के द्वारा:

K.P. Singh जी, नमस्कार ! काफी प्रयास के बाद भी जवाब नहीं पोस्ट हो पा रहा था । इस लिए मैंने इस प्रकार , आपका ज़वाब देना उचित लगा । देखिये- मैंने " सम्पूर्ण कवियों / शायरों " का उल्लेख नहीं किया है . अधिकांशतः प्रयोग किया है और अपवाद तो हर जगह ..होतें हैं . मैंने काफी वर्षों से.. कई कवियों और उनकी पत्नियों से प्रत्यक्ष मिली हूँ ..और उनकी स्थितियों से अवगत भी हुई हूँ ;इसके अलावा यह बात केवल मैंने ही नहीं महसूस की अन्य बहुत से लोग भी इसे स्वीकारतें हैं...सच्चाई यही है शायद... यह...दुनिया है... भाँति-2 के लोग..और उनकी सोच... आपका हार्दिक धन्यवाद | " ऐसे महान कवियों और शायरों को क्या कहना " पर अपने विचार लिखने के लिए | मीनाक्षी श्रीवास्तव

के द्वारा: meenakshi meenakshi

के द्वारा: meenakshi meenakshi

Akraktale जी, नमस्कार ! विचार तो विचार .ही.. हैं . देखा जाय तो हर कोई कभी कुछ तो कभी कुछ लिखता रहता है . हर तरफ अनेकानेक नए पुराने विषय की भरमार है . मैंने इस बार ' कवियों और शायरों ' पर कुछ लिखा है, बस | और अभी से नहीं शायद काफी वर्षों से .. मैंने इसे प्रत्यक्ष महसूस भी किया है. मैंने कई कवियों की पत्नियों की स्थिति देखी भी है . अतः इतने करीब से इस बात देखा है कि... और मैंने ' सम्पूर्ण कवियों / शायरों ' का उल्लेख नहीं किया है . अपवाद तो सदा होते है . "हाँ , यदि किसी कवि ने धोखे से …अपनी पत्नी की तारीफ़ में चंद शब्द बोले भी तो ” तीर-कमान ” बोले …ऐसे व्यंग भरे होंगें ..कि -बस ……" आपने कवि सुरेन्द्र शर्मा का ज़िक्र किया - तो वह 'उपर्युक्त कही गयी बात के अंतर्गत आतें हैं .' आप ने एक 'सवैया ' तुलसीदास 'जी का उदाहरणस्वरुप दिया है - कि उनकी बड़ी फजीहत हुई ..इसका क्या ..?..और क्यों .. देना चाह - आपने ? शायद आप भी मेरे विचार से ...कहीं-न कहीं सहमत दिखायी देतें हैं . शुक्रिया आपका ..अपने विचारो और उदाहरण से अवगत कराया . मीनाक्षी श्रीवास्तव

के द्वारा: meenakshi meenakshi

मीनाक्षी जी, वैसे मैं कवि नहीं हूं परंतु मैं आपके तर्कों से पूरी तरह सहमत भी नहीं हो सकता। मैं नहीं जानता कि आपको यह प्रेरणा कहां से मिली। सम्भव है इसमें आपके अनुसार सच्चाई हो क्योंकि कवि को विषय-प्रेरणा कहां से मिलती है यह कोई नहीं बता सकता। यहां तक कि शायद स्वयं कवि भी नहीं। यह कोई आवश्यक नहीं है कि श्रंगार लिखने वाला केवल दूसरों से ही प्रेरित हो। अब कोई कवि पहले श्रंगार लिखता है और बाद में उसकी शादी होती है तब क्या कहेंगे। ऐसे ही कई कवि ऐसे हैं जो विभिन्न भावों की रचनाएं लिखते हैं। क्या पता किसमें वे अपनी पत्नी या फिर घर-परिवार से प्रेरित होते हों। प्रकृति का वर्णन करने वाला क्या जरूरी है कि वह जंगल जाकर ही प्रेरित हों। ऐसे ही श्रृंगार के लिए जरूरी नहीं कि वह परनारियों को देखकर ही प्रेरित हो। काव्य स्वभावगत अनुभूति है और इसे बिल्कुल यथार्थ पर कैसे जोड़ा जा सकता है। आसमान के तारे तोड़ने का आशय केवल यही तो नहीं कि तारे तोड़े जाएं। रही बात हलाहल की तो अगर किसी पति की पत्नी या फिर पत्नी का पति कवि है तो एक-दूसरा हलाहल हृदय में कैसे रख सकता है। पति-पत्नी का यह सम्बंध तो नहीं हो सकता कि अगर एक नाम-ख्याति रचना से अर्जित करता है तो पत्नी या पति ये कहेंगे कि नहीं मेरे बारे में ऐसा ही लिखिए। अगर एक की प्रगति होगी तो निश्चित तौर पर दूसरे को गौरव महसूस होगा न कि दुख। अब ऐसे में अगर पत्नी हलाहल पिएगी तो फिर जो कवयित्री हैं उनके पति क्या पीते होंगे? जरूरी नहीं कि महिलाएं अपनी रचनाएं अपने पति का ही वर्णन करें। यह अलग बात है कि उसके सद्गुणों का वर्णन वे किसी अन्य रूप में अपनी रचनाओं में करती हों, इसलिए मेरा केवल यही कथन है कि अगर किसी विशेष मामले में ऐसा है तब तो ठीक है परंतु ऐसे में अधिसंख्य को दोषारोपित कैसे किया जा सकता है। फिर बात केवल नारी सौंदर्य, पुरुष सौंदर्य या प्रकृति सौंदर्य की.... सादर....

के द्वारा: bebakvichar, KP Singh (Bhind) bebakvichar, KP Singh (Bhind)

आदरेया मीनाक्षी जी सादर, आपने यह विषय क्यों उठाया या कि आप क्यों इस प्रकार सोच रही हैं यह तो मै नहीं जानता किन्तु मै यह अवश्य ही जानता हूँ कि जो सुंदरता प्रेयसी के रूप में होती है और वही सुंदरता पत्नी के स्वभाव में होती है. इसलिए अधिकाँश कवियों ने सुंदरता के वर्णन के लिए पत्नी को प्रेयसी के रूप में माना है. फिरभी हमारे कुछ कवियों कि बातें करूँ तो काका हाथरसी जी कि कई कविताओं में या फिर सुरेन्द्र शर्मा जी कि कविताओं में पत्नी का जिक्र होता है या कहिये कि शर्मा जी कि कविताएँ बिना पत्नी के पूर्ण ही नहीं होतीं तो अतिशयोक्ति नहीं होगी. यह उनका पत्नी के प्रति प्रेम के सिवा और क्या है. अधिकाँश रूप वर्णन कल्पना मात्र होते हैं वह हकीकत नहीं होते हकीकत शौर्य कि लिखी जाती है. और जब हम काल्पनिक कोई सुंदरता देख रहे हैं तो उसे परनारी कह देना भी कुछ ठीक तो नहीं लगता. ये मेरे अपने विचार हैं हो सकता है आप संतुष्ट न हों. मगर आपने एक विषय तो अवश्य ही सोचने के लिए दिया ही है. पत्नी से प्रेम कि बात पर तुलसीदास जी याद आ गये अभी किसी ने उनकी जो फजीहत पत्नी से मिलने जाने में हुई थी उस पर कोई रचना लिखी थी वहाँ मैंने एक प्रतिक्रया दी थी वह अपना एक सवैया प्रसंगवश प्रस्तुत कर रहा हूँ. स्नेहाशीष दें. तुलसी न अकेल रहे अब तो, हर के घर ही गण नाच रहे, पितु मात सभी समझाय रहे,फिरभी पतनी गुण गाय रहे, बिनकी न करें परवाह भले,जिनसे पतनी यह पाय रहे, पतनी न तजे इस खातिर वे,पतनी ढिग दूम हिलाय रहे/

के द्वारा: akraktale akraktale

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

के द्वारा: Abhishek Chandan Abhishek Chandan

अपने यहां भारतीय स्त्रियां अपने पति को ‘ पति परमेश्वर ‘ मानतीं हैं । और पूर्णत: अर्थात तन मन धन से बड़ी निष्ठा से समर्पित रहतीं हैं । इसके साथ साथ अपने ‘ पति ‘ के परिवार के सारे सम्बंधों को भली भांति निभाकर , उसके वंश को भी आगे बढ़ाने वाली होती हैं । अर्थात इस प्रकार “ वह अकेली ” अनेक दायित्वों की पूर्ति कर, ताउम्र अपने पति को बहुत प्रकार से आनंदित करती है ; जिसको हर सभ्य , संस्कारी नेक सोच रखने वाला ‘पति’ मानता है । वह भी इस बात के लिये उसको (‘पत्नी’) बहुत सम्मान देता है; साथ ही अपनी पत्नी को अपने जीवन में सबसे अच्छी “ अर्धांगिनी, सहचरी, व मित्र इत्यादि मान कर, उसका मान बढ़ाता है ।वह भी अपनी पत्नी को इतना महत्व देता है कि उसके बग़ैर वह अपने को अपूर्ण समझने लगता है । कहने का तात्पर्य यह है कि ऐसे भी ‘पुरुष’ हैं जो ऐसी नेक और पवित्र सोच रखतें हैं ।इस वक्त हर कांग्रेसी नेता , घपलों में और कुकृत्यों में इतना फस चूका है की उसे स्वयं नहीं मालूम की क्या और कब बोलना है ! निराशा और हताशा के माहौल में वो और क्या कर सकते हैं !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: meenakshi meenakshi

के द्वारा: meenakshi meenakshi

मीनाक्षी जी सादर नमस्कार, आपने तो अपने आलेख में महिलाओं की इतनी तारीफ़ कर दी है की लगा जैसे पुरुष कुछ करते ही ना हों, सारी जवाबदारी जैसे महिलाओं के सर ही हो.ये तो अन्याय है. मगर क्या करूँ सच्चाई के सामने नतमस्तक हूँ. सच है महिलाओं का मनेजमेंट तगडा है.सबेरे बच्चों को वक्त पर तैयार करने से टिफिन देने तक और पति के टिफिन साथ में परिवार के अन्य सदस्यों का चाय नाश्ता और फिर खुद का ऑफिस कोई भी वक्त चुका की गए. शायद ये कवायद पुरुष के बस की नहीं. इसीलिए मै महिलाओं के इस जज्बे को सलाम करता हूँ और पुरुष मित्रों से अपेक्षा करता हूँ की वह बाहर के कामो के अतिरिक्त घर के कामो में भी हाथ बंटाएं. अच्छा आलेख. बधाई.

के द्वारा: akraktale akraktale

के द्वारा: sadhna srivastava sadhna srivastava

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चातक जी, नमस्कार . चातक जी किसी भी बड़े -कार्य - बड़े से बड़े उद्योग , मिल - कारखाना , भवन या कुछ भी- इन सभी के पीछे जिन बेनाम महत्वपूर्ण लोगों का हाथ होता हैं - ये वही नीव की ईंट के सामान हैं - इन्हीं की अथक मेहनत से ही आज कितने " नाम " बन पायें है . अतः इनकी मेहनत और लगन को जरूर सम्मान मिलना चाहिए. हाँ , इस दिन का अवकाश होना न होना महत्वपूर्ण नहीं ; जितना कि इन सभी श्रम करने वालों को समाज में एक सम्मान का दर्जा मिलें और इनके हितों का ध्यान रखा जाये. अन्याय और अत्याचार तो किसी पर भी होना दंडनीय अपराध होता है फिर वो चाहे कोई भी वर्ग क्यों न हो . बहुत - बहुत धन्यवाद अपनी मूल्यवान प्रतिक्रिता देने के लिए.

के द्वारा: meenakshi meenakshi

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के द्वारा: meenakshi meenakshi

प्रकाश चन्द्र पाठक जी, वे व्यक्ति जो जानबूझकर भी अनजान बने रहतें हैं; जो माया की चमक में इस कदर भ्रमित रहतें हैं कि अपना आगा -पीछा कुछ भी नहीं समझ पातें है ; वही ऐसा करतें हैं .फिर यदि दुखों ..एवं कष्टों से छुटकारा पाना चाहतें हैं तो करना पड़ेगा. प्रारंभ में शायद कठिन लगे फिर ..अभ्यास से ..पता ही नहीं चलेगा ..स्वतः आदत या हमारे व्यवहार .हमारे .कर्म में ही ढल जायेगा ..और क्यों नहीं ..? जब कितने दिन व्रत - उपवास पूजा ..तीर्थ स्थान न जाने क्या क्या कर सकतें है तो उसकी जगह तो यह मार्ग अत्यंत आसन है ..श्रेष्ठ है उत्तम है कोशिश तो करें .. बिना प्रयास तो कुछ भी संभव नहीं होता .आगे प्रभु की मर्ज़ी .... बहुत से लोग ऐसे हैं आज भी..जिनका व्यक्तित्व अलग ही दिखाई देता है ...उनके चेहरे की चमक ..मुस्कराहट सबसे जुदा होती है ; शायद आपने भी कभी अनुभव किया होगा ...आज भी दुनिया कायम है तो उन्हीं के दम पर धन्यवाद अपनी रोचक प्रतिक्रिया देने के लिए.

के द्वारा: meenakshi meenakshi

buddha vikram sen जी , प्रभु राम त्रेता युग में " सिर्फ मर्यादा पुरुषोत्तम " के रूप में अवतरित हुए थे ;अतः उन्होंने मर्यादा की " कठोरतम" / दुस्सह मिसाल प्रस्तुत किया था ये थी -पहली बात.. दूसरी बात - " प्रभु राम की एवं लक्ष्मण की आज्ञा के विरुद्ध सीता जी ने सीमा रेखा पार किया था - तभी रावन उन्हें हरण कर ले गया था ; यदि न पार किया होता तो शायद सीता जी कभी राम से अलग न हुई होती तीसरी बात - सीता जी ने रामाज्ञा की अवहेलना की थी इसके बावजूद राम ने वो हर संभव प्रयास कर, उन्हें वापस अपने पास ले आये थे ;वे भी शायद पत्नी प्रेमवश ही ऐसा किया था ; और उस युग में वे जिस वचन बद्धता में वो बंधे थे ; भूल भी गए थे " तभी धोबी अर्थात जनता ... प्रजा जिसके वे पालनकर्ता थे उसने " उनकी इस बात को नीति के विरुद्ध बताया यानि श्री राम जी को उनकी प्रजा के दायित्व के प्रति ली गई शपथ याद दिलाई थी ; जिससे वे स्वयं भी कितने हताहत हुए थे ..ये दर्द ये पीड़ा किसी को नहीं दिखाई देती है ; सिर्फ प्रभु को ही दोषी माना जाता है . रावन जिसकी बहन राह चलते या कभी भी कहीं पर किसी से जबदस्ती शादी -शुदा लोगों को अपने प्रेम-जाल में फंसाने की या इश्कबाजी करे और अपमानित होने पर ; उसका भाई दूसरे की पत्नी को उठा लाये ..ये उचित..लगता है ; तो...ठीक.. जिसकी जैसी सोच होगी वो वैसा ही सोचेगा ..वैसी सलाह देगा .

के द्वारा: meenakshi meenakshi

के द्वारा: ajaydubeydeoria ajaydubeydeoria

के द्वारा: mataprasad mataprasad

सुरेन्द्र जी , बहुत- बहुत शुक्रिया " माँ की सीख " आपको भायी. "अब ‘ वो ‘ बोले सो रोक कर," ये पंक्ति मेरी पूर्व की " मासूमियत " से सम्बंधित भाव हैं ; यथा-- " बरसों पुरानी बात " फिर से में द्रष्टि डालियेगा - इसमें बेटी ने -अपनी जो बातें माँ से बतायीं थीं -" माँ की सीख " ( मासूमीयत ) में माँ ने उसकी नादां / भोली बातों का जवाब दिया है ; अब ‘ वो ‘ बोले सो रोक कर,"यह तो सिर्फ एक भाव द्रश्य दिखाया गया है कि जैसे- माँ ने उसको नेह से गोद में बिठाती है तो एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया जो बाल स्वाभाव में देखी जाती है ;की वो फिर " कुछ और बोले " सो रोक , अगर माँ उसको रोकेगी नहीं . तो आगे कैसे बताएगी कैसे समझाएगी कुछ. सिर्फ एक मात्र सहज एवं स्वाभाविक भाव का वर्णन है . आशा है अब आप समझ गए होंगे . धन्यवाद . मीनाक्षी श्रीवास्तव

के द्वारा: meenakshi meenakshi

के द्वारा: Ravindra K Kapoor Ravindra K Kapoor

के द्वारा: meenakshi meenakshi